इस शहर मे अकेला हूँ मैं…

इस दौडते फिरते शहर में.

तन्हाई का मेला हूँ मैं..

इस शहर मे अकेला  हूँ मैं…

कन्क्रीट का जंगल है ये.

अमानवता का संदल है ये..

इससे परे इस शहर में.

मानवता का झमेला हूँ मैं..

इस शहर मे अकेला  हूँ मैं…

तन्हा चला हूँ राहों पर मैं.

खुद को बचकर स्याहों से मैं..

अन्धेरे से इस शहर में.

उगता हुआ सवेरा हूँ मै..

इस शहर मे अकेला  हूँ मैं…

 

6 Comments

  1. Rsakshat 20/04/2012
    • "Shwet" 23/04/2012
  2. Yashwant Mathur 29/04/2012
    • सुनील गुप्ता 'श्वेत' sunilshwet 02/05/2012
  3. sangeeta swarup 30/04/2012
    • सुनील गुप्ता 'श्वेत' sunilshwet 02/05/2012

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