रिलीफ़ कैम्प में दीवाली

कसमसाती शाम के खिलते बदन पर
ये सितारों का लिबास
जगमगाते शहर की ऊँची प्राचीरें
क़ुमक़ुमों से भर गई हैं
रौशनी ही रौशनी है हर तरफ़
तुम हो जहाँ

यहाँ कितने युगों से
बस धुआँ है
गहरा मटियाला धुआँ

जल रहा है कुछ
जो सपनों से ज्यादा क़ीमती
रंगों से दिलकश है
जो अपनों से भी अपना
सुरों से भी ज्यादा भाने वाला
उम्मीदों से ज्यादा दिलफ़ज़ा
कलियों से भी कोमल है शायद
जल रहा है
मैं जहाँ हूँ …

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