यक़ीन और बेयक़ीनी के दरम्यान

आदी हो चुके हैं ये शब्द
नेताओं की भाषा बोलने के
बदलते रहते हैं इनके अर्थ भी
बदलते युग के साथ
इनकी बदलती भाव भंगिमाओं से
तंग आ चुके हैं शब्दकोश

जो कुछ मैं लिख रहा हूँ आज
न जाने क्या क्या अर्थ निकाले जाएँ
कल इन्ही शब्दों से

तो क्या
मैं भरोसा नहीं कर सकता
अपने शब्दों पर भी।

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