मुख्यधारा में

1.

उत्तरी-गोलार्ध्द से दक्षिणी-गोलार्ध्द तक
एक मरीचिका से दूसरी मरीचिका तक
दौड़ते-दौड़ते थक चुके हैं हम
प्रदूषण, अन्वेषण और अविष्कार के युग में
कहीं दिखाई नहीं देती
कोई निर्मल, निश्छल धारा
जिसके प्रवाह में
कोई सच्ची सांत्वना
कोई बुलावा हो हमारे लिए
कोई मज़बूत दीवार
जिसके साये में सुस्ता सकें
थोड़ी देर निश्चिन्त हो कर।

क्या पता
कब गिरा दिया जाए
मस्जिद का कौन सा मीनार
हमारे सर पर।
सन्तों और फ़क़ीरों की क़ब्रों पर
कब बन जाए कोई सड़क
या पेशाबख़ाना।
मदरसे में पढ़ते अनाथ बच्चे
रात के किस पहर
सपने में देख लें पुलिस को
और डर के मारे चिल्लाने लगें।
अरबी भाषा में क़ुरआन पढ़ते हुए
कब ख्याल आ जाए
उसामा बिन लादेन की मातृभाषा का।
घर से दफ्तर जाने के लिए निकलें हम
और मुठभेड़ में
किसी आतंकवादी के मरने की ख़बर पाकर
अपनी कलाइयाँ सूनी करनी पड़ जाएँ
मेरी ही बीवी को
क्या पता!

सदियों पहले
चार पत्नियाँ रखने की इजाज़त से बुनी
पुरानी, अवास्तविक चारपाई पर हम
काँप रहे हैं भय से
या सम्भोग कर रहे हैं
काश समझ पाते आप !
2.

आप ही की तरह
बहना चाहते हैं हम भी
बिना थके और बिना रुके
मुख्यधारा में

महीने के पहले दिन
अपनी गर्म जेब में हाथ डाले
बुरा नहीं लगता हमें भी
किसी अच्छे रेस्तराँ में जाना
अपनी अर्धांगिनी के साथ
ख़रीदना चाहते हैं हम भी
अपने बच्चे के लिए खिलौने
और किताबें
माँ के लिए एक मुसल्ला
जिसके बिना भी वह
मांगती रहती है दुआएँ
सारे जग की सलामती के लिए
हम भी ख़रीदना चाहते हैं
अपनी प्रेमिका के लिए क़ीमती उपहार
जिससे नापी जाती है
सच्चाई प्यार की
महानगरों में

क्या अन्तर है
हम में और आप में !

फिर भी इन दिनों
न जाने क्यों
रुंधे हुए गले से ही सही
चीख़ना चाहते हैं हम
आपके मीठे सपनों के सिरहाने बैठकर
गाना चाहते हैं कोई शोक गीत
सूर्य की लालिमा बिखरने तक

क्या हमें
अपने अस्तित्व के बिखरते छंद से
कोई धुन, कोई लय बुनने की
अनुमति देंगे आप !

One Response

  1. सुनील गुप्ता 'श्वेत' sunilshwet 24/04/2012

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