धूप आती रही इस काँच के घर में खुद ही

धूप आती रही इस काँच के घर में खुद ही
वो गिरफ्तार हुआ मेरे असर में खुद ही

तुम तो बस हाथ हिलाते हो गुज़र जाते हो
शहर आ जाते हैं वहशत के असर में खुद ही

हम तो अब भी हैं उसी तन्हा-रवी[1] के कायल
दोस्त बन जाते हैं कुछ लोग सफ़र में खुद ही

हर तसव्वुर को बदन देने में मसरूफ़ हूँ मैं
ख्वाब जागे हैं मिरे दस्ते-हुनर[2] में खुद ही

क्यों चले आए हो जलता हुआ सामान लिए
हम तो रहते हैं मियाँ मोम के घर में खुद ही
शब्दार्थ:

  1. ↑ अकेले चलने
  2. ↑ हुनर भरा हाथ

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