ख़ामोश रहा जा सकता है

यह कटा हुआ जंगल नहीं
जला हुआ शहर है
इसके बारे में
कुछ नहीं कह सकते पर्यावरणविद।
इस चुप्पी के लिये
बहुत सारे तर्क हैं इनके पास।

जैसे कि –
इस त्रासदी से कोई ख़तरा नहीं
जानवरों और दरिन्दों की
विलुप्त होती प्रजातियों को
बस इन्सान ही तो जलाए गए हैं।
साँपों की एक भी क़िस्म कम नहीं हुई
बस बच्चे ही तो लापता हुए हैं।
दुकानें ही लूटी गई हैं
हाथी के दाँत या शेर की खाल की
तस्करी तो नहीं हुई।
कौमार्य ही तो छिना है लड़कियों का
हिरन से कस्तूरी तो नहीं।
गर्म ख़ून ही तो बहा है नालियों में
गंगा या यमुना का पानी तो प्रदूषित नहीं हुआ।
नरसंहार ही तो हुआ है
गो-हत्या तो नहीं हुई।

जब समर्थन में
इतने सारे तर्क हों
तो चुप रहा जा सकता है
अन्तरात्मा की अनुमति के बिना भी।

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