आनँद को कँद बृषभानुजा को मुखचँद

आनँद को कँद बृषभानुजा को मुखचँद ,
लीला ही ते मोहन के मानस को चौरे है ।
दूजो तैसो रचिबो को चहत विरँचि नित ,
ससि को बनावै अजौँ मन को न मोरे है ।
फेरत है सान आसमान पै चढ़ाय फेरि ,
पानी पै चढ़ायबे को वारिधि मे बोरे है ।
राधिका के आनन के सम न बिलोके याते ,
टूक टूक तौरे पुनि टूक टूक जौरे है ।

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