बेहयाई, बेवफ़ाई, बेईमानी हर तरफ़

बेहयाई, बेवफ़ाई, बेईमानी हर तरफ़
धीरे-धीरे मर रहा आँखों का पानी हर तरफ़

सोचता हूँ नस्ले-नौ कल क्या पढ़ेगी ढूँढकर
पानियों पर लिख रही दुनिया कहानी हर तरफ़

फिर भी कुछ दिखता नहीं जबकि उजाला खूब है
रौशनी-सी, तीरगी की तर्जुमानी हर तरफ़

मुल्क तो दिखता नहीं है मुल्क में यारो कहीं
दिख रही लेकिन है उसकी राजधानी हर तरफ़

किसको-किसको रोइएगा और क्या-क्या ढोइए
एक जैसी लानते और लनतरानी हर तरफ़

बर्फ़ के तोदे ही तोदे अब ख्य़ालो-ख़्वाब् पे
पर ग़ज़ल में `नूर’ जी! आतिश-बयानीं हर तरफ़

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