खेत के बाहर हैं फ़स्लें और पानी खेत में

खेत के बाहर हैं फ़स्लें और पानी खेत में
इतना बरसाया खुदा ने मेहरबानी खेत में

खेत ही था गाँव उनका खेत ही था देश भी
डूब सपनों की गई यूँ राजधानी खेत में

बह गईं सब रोटियाँ-लंगोटियाँ भी बाढ़ में
बच गया आँखों में कुछ, कुछ और पानी खेत में

खनखना उठ्ठेगी फिर सोने के कंगन-सी फ़सल
जब पिघल जाएगी सोने- सी जवानी खेत में।

स्वप्न-ग्रासी योजनाएँ, बघ-नखी दुर्नीति की
ढूँढने पर ‘नूर’ मिलती है कहानी खेत में

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