अलि दसे अधर सुगन्ध पाय आनन को

लि दसे अधर सुगन्ध पाय आनन को,
कानन मे ऎसे चारु चरन चलाए हैँ ।
फाटि गई कँचुकी लगे ते कँट कुँजन के ,
बेनी बरहीन खोली बार छबि छाए हैँ ।
बेग ते गवन कीन्होँ धक धक होत सीनो ,
दीरघ उसासैँ तन स्वेद सरसाए हैँ ।
भली प्रीति पाली बनमाली के बुलाइबे को ,
मेरे हेत आली बहुतेरे दुख पाए हैँ ।

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