तू ही को चाहत वे चित मौ अरु तू ही हियो उनपै ललचावत

तू ही को चाहत वे चित मौ अरु तू ही हियो उनपै ललचावत ।
मैं ही अकेली न जानत हूँ यह भेद सबै ब्रजमँडली गावत ।
कौन सँकोच रहो री नेवाज जो तू तरसै औ उन्हैँ तरसावत ।
बावरी जो पै कलंक लग्यो तो निशँक ह्वै काहे न अँक लगावत ।

Leave a Reply