धूल-भरी दोपहरी

धूल-भरी दोपहरी
जगती के कण-कण में गूँजी आकुल-सी स्वर लहरी
सरस पल आते-जाते
करुणा सिकता भर लाते
एक मूर्च्छना-सी प्राणों पर बेमाने बरसाते
अलसता होती गहरी।

मधुर अनमनी उदासी
एक धूमिल रेखा-सी-
छाई है; बहता जाता है पवन अरुक संन्यासी
कौन देश की ठहरी?
आकर यों चल दिए कहाँ ओ जग के चंचल प्रहरी!

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