धीरज

आपां सगळां जाणां- जूंण रो ’ऐंड’ पण तो ई खथावळ नीं करां, जीवां जूण नै जूण री गत । जाणां- छेकड़ में कीं नीं बचैला, सिवाय ओळूं-बिरछ रै ; का फेर बचैला कीं सबद जिका सूं कोई कवि बणावैला- ओळूं-बिरछ ।

म्हैं परखणो नीं चावूं- आप रो धीरज, क्यूं कै म्हैं आगूंच जाणूं- आप रो धीरज है आप मांय ; बिंयां आप सगळी बातां सगळा भेद एक चुटकी में ठाह करणा चावो पण कविता री तीजी ओळी उतावळ ठीक कोनी ।

माफ करजो, आ कविता जूण दांईं फगत दो ओळी री है, जिण मांय सूं एक ओळी म्हैं मांड दीवी अर दूजी ओळी आप नै मिल जावैला ; म्हैं आगूंच कैयो नीं- धीरज है आप मांय । बा ओळी अचेत पड़ी है आपां री ओळूं मांय इण पैली ओळी रै विजोग मांय ।

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