रोज़नामचा

उठता हूँ नींद से
और ईश्वर को धन्यवाद देना भूल जाता हूँ
कि एक दिन की ज़िन्दगी आई हक़ में
तैयार होता हूँ, नए दिन को रोज़ की तरह
पुराने ढंग से जीने के लिए

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नींद से जगाता हूँ ’किट्टू’ को
जिसे अब स्कूल जाना होता है
सहेजता हूँ क़िताबों का बस्ता
कपड़े इस्तरी करता हूँ
भरता हूँ पानी की बोतल
और अक्सर ही बाँध देता हूँ
जूतों के तस्मे

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स्कूल की गाड़ी में अदृश्य होती
दो नन्हीं बाँहों से विदा लेते,
घर के लिए दूध-डबलरोटी
सब्जी और दाल-तेल-नून
चावल-आटा, ज़रूरत के मुताबिक
लेकर लौटता हूँ

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यह मेरे दिन का एकान्त है
चाहूँ तो पढ़ सकता हूँ किताबें
टीवी पर समाचार सुन सकता हूँ
डायरी में लिख सकता हूँ कुछ बातें
जिन्हें कह नहीं पाता किसी से,
लेकिन इस एकान्त पर
ज़िन्दगी के दूसरे सरोकार
अक्सर हावी होते हैं,
अगले एक घण्टे तक घर में
विचरते हैं पति-पत्नी, माता-पिता
महज मकान के किराए, स्कूल की फ़ीस
और तमाम ज़रूरी खर्च के बाद
बचत का हिसाब लगाते

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सुबह नौ के बाद
बहुत जल्दी बजा करता है दस
नहाते-धोते, खाते-पीते,
नौकरी-पेशा जीवन जीते,
सड़कों पर भागते-दौड़ते
बस-ट्राम, पाताल रेल की सीढ़ियाँ
चढ़ते-उतरते पहुँचना होता है दफ़्तर

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अब मेरा परिचय बदल जाता है
यह फ़ाइलों तले दबी ज़िन्दगी है,
जहाँ स्वतन्त्र नहीं कुछ भी
साँसें मोहताज हैं जहाँ, अनुमोदन की
जीवन के कारोबार चलते हैं पन्नों पर
सात-आठ घण्टों के लिए, एक आज़ाद आदमी
ग़ुलाम में बदल जाता है
और विवेक के असंख्य दंश झेलता
घर लौटता है, आँखों में ढलती शाम लिए

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मुट्ठी में रेत जैसे कुछ पल
आराम कहाँ, अभी तो बच्चे का
ढेर सारा होमवर्क है,
परीक्षा की तैयारियाँ हैं
थोड़ा सा खेलकूद है, थोड़ी ख़ुशी है
बहुत थोड़ा वक़्त है सुकून का
आरती की थाली में
कपूर जितनी ख़ुशी है

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रोशनी बुझ चुकी है
अपने-अपने बिस्तर में जा चुके
मेरे घर और पड़ोस के लोग
मेरे पास थोड़ा वक़्त है, बिलकुल निजी,
चाहता हूँ जागूँ कुछ देर और

ऐसे में, मत पूछना कब लिखता हूँ कविताए~म
इसी रोजनामचे में साथ-साथ चलती है कविता

दुखती पेशियों के खिंचाव में
बनते- बिगड़ते हैं शब्द
घर के किसी कोने में, समय
बुनता रहता है, चालाक मकड़ी-सा
एक महीन जाल, और घेर लेता है
एक मक्खी को आख़िरकार

पूरी ईमानदारी, पूरे साहस और
खुले कण्ठ से, यह आत्मस्वीकार है मेरा ।

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