मौत

1.
स्वाभाविक मौत भी, देखिए
आती है बड़ी मुश्किल से

खण्डहर की उम्र
जीते हैं, तमाम बुरे लोग
जिसके ढहने का अन्दाज़ा
नहीं होता अच्छे लोगों को

अच्छे-बुरे के बीच
ज़िन्दगी-मौत की तरह
चलता है, चूहे-बिल्ली का खेल

अच्छाई और ज़िन्दगी
दोनों, हैं तभी तक सुरक्षित
जब तक हैं बिलों में

बाहर आते ही, चूहे की मौत
मारी जाती है ज़िन्दगी

ऐसे अस्वाभाविक समय में
उसे अपने लिये, स्वाभाविक मौत चाहिए थी ।

2.
मौत, जब दूर रहती है
पैदा करती है ख़ौफ़

मौत के नज़दीक आकर
सबसे बेख़ौफ़ होता है आदमी

मरते हुए आदमी के
साहस के आगे
झुकते हैं दुनिया के
बड़े-बड़े दुःख

साधो, भय को देखना हो
नतमस्तक, करबद्ध, तो देखो
उस आदमी की आँखों में
जिसे मालूम है,
ज़िन्दगी की उलटी गिनती ।

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