नदी : कुछ चित्र

1.
नौकाएँ लौट आई हैं
घाटों पर, दोनों ओर
हवाओं का भीषण शोर

एक सोई हुई नदी की नींद में पड़ चुका है ख़लल
स्याही ढल चुकी है ढेर सारी
आसमानी स्लेट पर

चोट खाई नागिन-सी
फुफकारती हैं फ़ेनिल लहरें
कामातुर नदी, बेचैन होकर
बदलती है करवटें,
ये इसके अभिसार के दिन हैं

धन्य हे काल वैशाखी,
धन्य तुम्हारा यह रूप ।

2.
ख़ामोश है नदी
नौकाएँ घूम रही हैं निर्विघ्न
जैसे शान्त जल में तैरते
काठ के फूल,
शरद का नीला आकाश
लहरों की झिलमिल
जैसे सोने की थाली,

नाविकों ने डाल दिए हैं जाल
मछलियों की अब ख़ैर नहीं,
आज नदी, खूँटे से बँधी गाय है ।

3.
नदियों के किनारे बसीं
बड़ी-बड़ी सभ्यताएँ
बताते हैं इतिहासकार,
इतिहास की क़िताबों से
फिर भी, बाहर कर दी जाती हैं
कुछ कहानियाँ
इन कहानियों में कुछ गाँव थे
जो नदी के रास्ते में पड़ते थे,
कुछ लगातार चौड़े होते तट थे
जिनकी मिट्टी कटती रही युगों से,
कुछ स्त्रियाँ थीं, जो नहाने गईं
और कभी नहीं लौटीं

सभ्यताओं का इतिहास लिखने वालों
अभी- अभी एक कहानी बन रही है
क़िताबों के बाहर, भागीरथी के तट पर
यहाँ घाट पर खड़े ये बच्चे, जितनी बार
घुमा कर फ़ेंकते हैं रस्सी
निकाल लाते हैं कुछ न कुछ , नदी के पेट से

इनकी रस्सियों के एक छोर पर
बँधे हैं, दुनिया के सबसे जादुई चुम्बक ।

4.
एक नदी बहती है मेरे भीतर
यहाँ विसर्जित करता हूँ
स्वप्न-निर्मित देव प्रतिमाएँ

चुपचाप बहती है नदी
तट पर पड़े रहते हैं
पार्थिव शरीर देव-मूर्तियों के,
ज्वार का पानी चढ़ता है जब
चुपचाप तैराता हूँ
उम्मीदों से भरी एक नाव,

एक नदी बहती है मेरे भीतर…

5.
कभी सावन में
बरसती हैं बूँदें आशीर्वाद बनकर
भीग जाता है नदी का तन-मन

कभी भादो में
गिरती है धूप समिधा की तरह
सुलग उठता है नदी का मन,

सोच में डूब जाती है नदी
क्या बादल गए कलकत्ता,
’चम्पा’[1] के बालम संग ?

शब्दार्थ:

  1. ↑ कवि त्रिलोचन की कविता : “चम्पा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती”

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