जड़ें : कुछ कविताएँ

1.
बहुत गहरे धँसी थीं वे जड़ें
जिनसे जुड़े रहे हम
दूर परदेस में,

जड़ों से बहुत दूर
कुछ घोंसले थे, ऊँची टहनियों पर
इन घोंसलों को शहर कहते थे सभ्यजन

एक ग़ज़ब का गुरुत्वाकर्षण
बना रहता था दोनों के बीच
एक तनाव, हमारे आने-जाने,
चढ़ने- उतरने के बीच

इस तनाव में पाया हमने
अपना स्थायी पता,
यह हमारे पूर्वजों का पता था,
उनका अर्जित वैभव,
जिसे छोड़ आए थे हम
लेकिन जो साथ रहा हरदम
जड़ों की तरह ।

2.
सूख जाता है विश्वास का जल
सूख जाती हैं जड़ें, धरती में सोई-सोई
उखड़ जाते हैं रिश्तों के पेड़,

अविश्वास की आँधी में
उजाड़ हो जाते हैं जंगल हरे-भरे

जड़ें न हों तो, दोमट को,
रेत में बदलते देर नहीं लगती ।

3.
जड़ों की नोंक है
कि तलवार की धार

कुशल-क्षेम नहीं पूछ्तीं तलवारें
जब गर्दनों पर उतरती हैं,
जड़ें भी मेहरबान नहीं होतीं, दीवारों पर,
जब वे अपनी जगह बनाती हैं
पकी ईंटों के बीच से

ज़ुर्म किया हमने
कि बनाया घर बरगद की छाँव में
रहा जड़ों की ताक़त से अनजान ।

4.
जड़ों का ऋणी है पेड़
पृथ्वी का जल खींचकर, पाताल से,
सबसे नई फ़ुनगी की ऊँचाई तक
पहुँचाती हैं जड़ें

कृतज्ञता-बोध से भरी
झुकी रहती हैं टहनियाँ
फल-फूल-पत्तों से लदी

सृष्टि के सबसे बड़े कारख़ाने के लिए
ज़रूरत भर पानी, जुटाती हैं जड़ें
तब जाकर, सूरज का ताप,
बदलता है, सुन्दर आहार में ।

5.
मिट्टी से
कौन सा पदार्थ
लेती हैं जड़ें
कि उखड़ कर भी, ज़मीन से,
लौटती हैं उसी ओर

किस रसायन की खोज में
लटकी रहती हैं, उन्मत्त,
शाखाओं को पकड़े एक हाथ से
दूसरा मिट्टी की ओर बढ़ाए

जड़ें, जवान बेटियाँ हैं, पेड़ों की
मिट्टी को, अपने दाँतों-नाखूनों से,
जकड़े रहती हैं
पिता की इज़्ज़त की तरह
बचा कर रखती हैं मिट्टी को ।

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