ये दिल बेचैन होता है, कलेजा काँप जाता है – SALIMRAZA REWA

याद-ए-हुसैन ..
ये दिल बेचैन होता है, कलेजा काँप  जाता है !
वो मंज़र कर्बला का जिस घड़ी भी याद आता है !

रहे हैं भूखे प्यासे फ़ौज के घेरे में रातो दिन ! 
मगर होठो  पे सच्चाई का परचम मुस्कुराता है !

गले में चुभ गया फौजे लई का तीर  बेकस पे !
तड़पता प्यास से मासूम असगर याद आता है !

कहीं शमशीर की धारे कहीं पे खूं  की बौछारें !
वो चीखों  का समां रोना तड़पना याद आता है !

ये थी ईमान की कूबत ये थी अल्लाह की चाहत !
नबी का लाडला सजदे में अपना सर कटाता है !

हुसैन इब्ने अली का ही जिगर था ये जहाँ वालों !
कोई दुनिया में है जो इस तरह वादा निभाता है !

“ज़माना आज भी रंजूर हैं इस खूं फिशानी से !
 जो दर्दे ग़म को सुनता है वहीं आँसू बहाता है !

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