बेबस देखता रहा अपना बुद्ध न हो पा

देखता रहा जंगल को
लकड़ बग्घे की तरह
और झटपट मेरे सपनों में जुटने लगा
एक झुण्ड।

मैंने प्यार किया
कि जीना असंगत न लगे
परिवार बनाया
फिर पता नहीं
मेरी अपनी ही भूख थी वो
या कि शावकों की कोई गुप्त पुकार-
मैं उठा, बेताब
कूदता रहा झुके हुए पुठठों पर
पूरा एक झुण्ड नहीं बन गया जब तक
दुर्गन्ध में नहाया
दौड़ता-भागता
एक दुर्बल हिरन को सूँघता हुआ।

‘‘सभी को कुछ न कुछ चाहिए’’
मैंने दलील दी-
‘‘जैसे इस हिरन को घास
और मुझे मांस।’’

मैं देखता रहा, चुपचाप
ठीक एक लकड़ बग्घे की तरह
बेबस,
अपना ‘बुद्ध’ न हो पाना।

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