भीड़ के संग भीड़ से कटके

ज़िन्दगी में यहाँ- वहाँ भटके
क्या मिला अंत में बता खटके

आचरण में न बात ला पाये
वक़्त ज़ाया किया उसे रटके

आखरी जब उड़ान हो या रब
मन हमारा ज़मीं पे ना अटके

वार पीछे से कर गये अपने
काश करते मुकाबला डटके

संत है वो कि जो रहा करता
भीड़ के संग भीड़ से कटके

राह आसान हो गयी उनकी
जो चलें यार बस जरा हटके

बोलना सच शुरू किया जबसे
लोग फिर पास ही नहीं फटके

आजमाना न डोर रिश्तों की
टूटती है अगर लगें झटके

रहनुमा से डरा करो नीरज
क्या पता कब कहाँ किसे पटके

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