दर्द दिल में मगर लब पे मुस्कान है

दर्द दिल में मगर लब पे मुस्कान है
हौसलों की हमारे ये पहचान है

लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है

गर न समझा तो ‘नीरज’ बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है

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