तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो

तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो
इस कमी का मुझे एहसास दिलाते क्यूँ हो

डर जमाने का नहीं दिल में तुम्हारे तो फिर
रेत पर लिखके मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो

दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो

हमपे उपकार बहुत से हैं तुम्हारे,माना
उँगलियों पर उसे हर बार गिनाते क्यूँ हो

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो

ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

प्यार मरता नहीं “नीरज” है पता तुमको भी
फिर भी मीरा को सदा ज़हर पिलाते क्यूँ हो

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