कहाँ मर्ज़ी से अपनी ही कहानी हम बनाते हैं

कहाँ मर्ज़ी से अपनी ही कहानी हम बनाते हैं
पहाड़ी से गिरे पत्थर सरीखे, लुढ़के जाते हैं

मिटेंगे फासले सारे अगर दो साथ मेरा तुम
बढ़ाओ तुम कदम इक, और हम भी इक बढाते हैं

बहुत गाये हैं हमने गीत जिनके वास्ते यारों
खफ़ा होते हैं, जब हम खुद की खातिर गुनगुनाते हैं

कहाँ बसते है ऐसे लोग ये हम को बताना तुम
ख़ुशी में दूसरों की झूम कर जो गीत गाते हैं

जिसे कहते हो तुम जन्नत हमें हासिल वो होती है
किसी रोते हुए बच्चे को जब हम गुदगुदाते हैं

कवायद मत करो यारों किसी को भी बदलने की
सुखी रहने को आओ, खुद में ही बदलाव लाते हैं

करीबी दोस्त ‘नीरज’ देखते हैं घाव जब मेरे
मिला मरहम नमक में प्यार से, सारे लगाते हैं

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