न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा

न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा ।
तमाम रात भटकता रहा गुमान मेरा ।

मैं घर बसा के समंदर के बीच सोया था ।
उठा तो आग की लपटों में था मकान मेरा ।

जुनूँ[1] न कहिए उसे ख़ुद अज़ीयती[2] कहिए
बदन तमाम हुआ है लहूलुहान मेरा ।

हवाएँ गर्द की सूरत उड़ा रही हैं मुझे
न अब ज़मीं ही मेरि है न आसमान मेरा ।

धमक कहीं हो लरज़ती हैं खिड़कियाँ मेरी
घटा कहीं हो टपकता है साएबान मेरा ।

मुसीबतों के भँवर में पुकारते हैं मुझे
अजीब लोग हैं लेते हैं इम्तेहान मेरा ।

किसे ख़तूत[3] लिखूँ हाले दिल सुनाऊँ किसे
न कोई हर्फ़ शनासा[4], न हम-ज़ुबान[5] मेरा ।

शब्दार्थ:

1. ↑ दीवानगी, एक बीमारी
2. ↑ स्वयं को दुख देना
3. ↑ ख़त (पत्र) का बहुवचन
4. ↑ लिपि जानने वाला
5. ↑ एक ही भाषा को जानने वाला

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