केदारनाथ सिंह को पढ़ते हुए

फ़र्क पड़ता है, केदार
“तुमने जहाँ लिखा है ‘प्यार’
वहाँ लिख दो सड़क
फ़र्क क्या पड़ता है

बस्ती में एक लड़की
रस्सी से झूलते हुए पाई जाती है, केदार
उसके प्रेमी ने कहा था
“फ़र्क नहीं पड़ता
यह मेरे युग का मुहावरा है”

तुम्हारी आँखों में बैठा हुआ सच
मेरी आँखों में बैठे हुए सच जैसा नहीं है, केदार

फ़र्क पड़ता है

राह चलते हुए
कभी भी रोककर मांगा जा सकता है पहचान-पत्र
अब कभी भी वापस आने पर घर नहीं कहता धन्यवाद
पिता की आँखों में टंगी रहती है पृथ्वी जैसी लम्बी बड़ी उदासी

घिस चुकी होती है घंटे की मोहड़ियाँ
एक अदद बहाली की तलाश में
कई बार हो चुके होते हैं हम बाघ
अपने ही दाढ़ से अलग करते है अपना टंगा हुआ घर

फ़र्क पड़ता है, केदार
उन्नीस सौ चौंसठ और दो हज़ार चार में
यानि कुल चालीस वर्षों का फर्क पड़ता है केदार
एक बूढ़े और एक जवान में।

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