अट्ठाइस साल की उम्र में

सचमुच यही उसके प्रेम करने की सही उम्र है
जहाँ उसके सपनों में लहलहा रहा हो
एक पवित्र सुर्ख़ लाल गुलाब

इसी उम्र में दिल से निकलती है सच्ची प्रार्थना
जिसे कबूल करने से हिचकिचाता है समाज
इसी उम्र में खुलते हैं डैने जिससे तुलना पड़ता है सारा आकाश
इसी उम्र में पैर में लग जाते हैं चक्के
जिससे नापनी पड़ती है सारी पृथ्वी

यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण उम्र होती है
जहाँ सबसे ज़रूरी होता है एक अनुभवी प्रेमी का अनुभव
पर अफ़सोस अपने अनुभव को सबसे श्रेष्ठ और सबसे पवित्र बताते हुए
हम ठगे जाते हैं
कभी-कभी हम जीत जाते हैं और जश्न मनाते हुए
रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं अपने अन्दर ही

यहाँ तन हावी नहीं होता मन पर
मन बहुत ही हल्का पारदर्शी और पवित्र होता है इस उम्र में
तन की बात ही नहीं करता मन

ऐसी स्थितियों से गुज़र चुका हूँ मैं
जहाँ सिर्फ़ दो आँखें और दो बातें ही महत्त्वपूर्ण होती हैं
इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होता है
सपने में लहलहा रहे सुर्ख़ पवित्र गुलाब का लहलहाते रहना
पर क्या करूँ
जब सुबह उठता हूँ रात में भंभोड़ दिए गए
एक जंगली जानवर के पंजों तले अपने क्षत-विक्षत शव को लिए
तब लगता है बिना तुम्हें पाये तुम्हें प्रेम करना एक नाटक करना है

कई बार सोचा तुम्हें कहूँ
प्रेम की अन्तिम परिणति दो रानों के बीच होती है
हर बार बीच में आ गई
तुम्हारी दो आँखों में दिपदिपाती हुई पवित्रता
लहलहाता हुआ सुर्ख़ गुलाब
और ऐसा क्यूँ लगा कि गंगा से नहाकर माँ के साथ लौट रहा हूँ घर
शायद तुम्हारे अंदर मेरी माँ भी है

एक बार इसी पवित्रता से डरकर
एक और पवित्रता की खाल ओढे तुम्हें निमंत्रित कर बैठा था
— चलो शादी कर लें। 
— ” नहीं, पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद
तुम्हारे सामने अंदर का जानवर न जाने क्यों शांत ही रहता है
उस दिन उस समय भी शांत रहा
जबकि रात में बिस्तर पर एक बार और वह हिंसक हो उठा था
मैं मज़बूर- लाचार हो ‘प्यार’ , ‘पवित्रता’ जैसे शब्दों से क्षमा-याचना मांगता रहा
अपने को भंभोड़वाते हुए

तुम क्या जानो
एक अट्ठाइस साल की उम्र के लड़के की ज़रूरत
जो अपनी उम्र चौबीस साल बतला रहा हो
आख़िर तुम्हारी उम्र कम है
और इस उम्र से मैं भी गुज़र चुका हूँ

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