अब वैसा नहीं हो पाऊँगा

हे पिता !
जब तक रहा आपका
सिर पर साया
मैं घूमता रहा
देश-प्रदेश
बेफ़िक्र
लेकिन बाद में तो
बँध गया मैं
घर के खूँटे से

एक सम्बल है अब भी
जो पनप रहा है
बेटे के रूप में
लेकिन यह
उतना बेफ़िक्र
कहाँ कर पाएगा मुझे

मैं घर से निकला तो
घर में बैठे बेटे की
चिंता
मुझे सताती रहेगी

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