रोंको ना मुझे  कोई फूल अब  बिछाने   दो !- SALIMRAZA REWA

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                    नात -ए ! मुबारक़

रोंको ना मुझे  कोई फूल अब  बिछाने   दो!
मुस्तफ़ा की आमद है रास्ता सजाने दो !-

ज़िन्दगी में फिर ऐसा मौक़ा आए न आए !
आज उनकी चौखट पे दर्द दिल सुनाने दो !

मेहरबां  हुए शायद दो जहान  के रहबर !
ख़ुश्बू है मदीने की आ रही है आने दो !

मुश्किलों ज़रा हटना रास्ता न अब रोंको !
दीद की तमन्ना है मुझको तैबा जाने दो !

रंग लाएगी चाहत मैं मदीना  पहुचूँगा! 
ज़ोर गर्दिशों  को  भी  अपना  आज़माने  दो !

सब  मुराद  पाते  हैं  मैं  भी  बैठा हूँ दर पर !
जो  नसीब  बिगड़ा  है उसको तो बनाने दो !

कुछ   गुनाह  कम होंगें दिलको कुछ ख़ुशी होगी!  
अश्क  हैं  नेदामत के  ऐ  ”रज़ा”   बहाने  दो!   
salimraza rewa

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