खिली सुनहरी सुबह

खिली सुनहरी
सुबह ग्रीष्म की
बिखरे दाने धूप के।

कंचन पीकर मचले बेसुध,
अमलतास के गात।
ओस हो गई पानी-पानी,
जब तक समझे बात।

रही बाँचती कुल अभियोजन,
अनजाने प्रारूप के ।

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