जब याद अचानक माज़ी की परतों से कोई आएगी

जब याद अचानक माज़ी की परतों से कोई आएगी

तब रिमझिम आँसू बरसेंगे और ग़म की बदली छाएगी

 

मंज़र कोई दिख जाएगा, इक बर्ख बदन में दौड़ेगी

बीते बरसों की याद कोई आ कर मन को भरमाएगी

 

जब भूले- बिसरे नग़मों के संग बीती घड़ियाँ लौटेंगी

वो याद मेरी तनहाई में फिर से तूफ़ान मचाएगी

 

माज़ी में दो पल जी लूँगा, इक धुंधली सूरत उभरेगी

ग़र ग़फ़लत में खो जाऊँगा वो राह मुझे दिखलाएगी

 

चुपचाप बहुत बातें होंगी, कुछ चैन मुझे आ जाएगा

छूना चाहा तो रातों के साये में वो खो जाएगी.

 

बर्ख = तरंग, लहर, करेंट

 

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

८ सितम्बर २००७


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