दम बुलबुले-असीर का तन से निकल गया

दम बुलबुले-असीर का तन से निकल गया
झोंका नसीम का जूं ही सन से निकल गया।

लाया वो साथ ग़ैर को मेरे जनाज़े पर
शोला-सा एक ज़ेबे-कफ़न से निकल गया।

साक़ी बग़ैर शब जो पिया आबे-आतशीं
शोला वो बन के मेरे दहन से निकल गया।

अब के बहार में ये हुआ जोश, ऎ जुनूँ!
सारा लहू हमारे बदन से निकल गया।

उस रश्के-गुल के जाते ही बस आ गई ख़िजाँ
हर गुल भी साथ बू के चमन से निकल गया।

अहले-ज़मीं ने क्या सितमें-नौ किया कोई!
नाला जा आसमाने-कुहन से निकल गया।

सुनसान मिस्ले-वादि-ए-ग़ुरब है लखानऊ
शायद कि ’नासिख़’ वतन से निकल गया।

Leave a Reply