वाएजा मस्जिद से अब जाते हैं मयख़ाने को हम

वाएजा मस्जिद से अब जाते हैं मयख़ाने को हम
फेंक कर ज़रफ़े-वज़ू लेते हैं पैमाने को हम।

क्या मगस बैठे भला उस शोला-रु के जिस्म पर
अपने दाग़ों से जला देते हैं परवाने को हम।

तेरे आगे कहते हैं गुल खोलकर वाज़ू-ए-बर्ग
गुलशने-आलम से हैं तैयार, उड़ जाने को हम।

कौन करता है बुतों के आगे सजदा, ज़ाहेदा!
सर को दे दे मार कर, तोड़ेंगे बुतख़ाने को हम।

जन ग़िज़ालों के नज़र आ जाते हैं चश्मे-सिहाह
दश्त में करते हैं याद सियाहख़ाने को हम!

बोसा-ए-ख़ाले-ज़नख़दा से शिफ़ा होगी हमें
क्या करेंगे, ऎ तबीब इस तेरे बिहदाने को हम।

बांधते हैं अपने दिल में ज़ुल्फ़े-जानाँ का ख्याल
इस तरह ज़ंजीर पहनाते हैं दीवाने को हम।

पंजा-ए-वहशत से होता है गरेबाँ तार-तार
देखते हैं काकुले-जना में जब शाने को हम।

अक्ल खो दी थी, जो ऎ ’नासिख़’ जूनूने-इश्क़ ने
आश्ना समझा किए इक-उम्र बेगाने को हम।

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