मृतक शरीर

घर में रहा न रहने वाला।
खोल गया सब द्वार किसी में, लगा न फाटक-ताला,
आज निशंक अदृष्ट बली ने, घेर-घसीट निकाला।
जाने किस पुर की बाखर में, अबकी बार बिठाला,
हा ! प्रासादिक परिवर्तन का, अटका कष्ट-कसाला।
ढंग बिगाड़ दिया मन्दिर का, अंग-भंग कर डाला,
श्रीहत हुआ अमंगल छाया, कहीं न ओज-उजाला।
‘शंकर’ ऐसे पर-बन्धन से, पडे़ न पल को पाला,
आग लगे इस बन्दी-गृह में, मिले महा सुख-शाला।

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