मरण

घर को छोड़ गयो घर वारो।
बारह बाट आज कर डारो, अपनो कुनबा सारो,
भोग-विलास विसार अकेलो, आप निशंक सिधारो।
शोभा दूर भई बाखर की, धाय धँसो अँधियारो,
चरों ओर उदासी छाई, दिपत न एकहु द्वारो।
आओ रे मिल मित्र-मिलापी, इस-उत खोज निहारो,
कौन देश में जाय बिराजो, कौन गैल गहि प्यारो।
अब काहू विधि नाहिं मिलेगो, मिट गयो मेल हमारो,
‘शंकर’ या सूने मन्दिर को, धीरज धार पजारो।

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