बेड़ा पार

अब तो वाद-विवाद विसार।
वीर बहाय जाति-जगती पर प्रेम-सुधा की धार,
धारा में नीकी करनी की नयी नवरिया डार।
तू केवट बन ता करनी को दान-वेणु कर धार,
जीवन के वासर पथिकन को गिन-गिन पार उतार।
पर उपकार-भार भर रीते रहेन साधन हार,
वेतन के मिस तोहि मिलेंगे मनमाने फल चार।
ऐसो ही उपदेश देते हैं वेद पुकार-पुकार,
‘शंकर’ औरस पै मत चूके करले बेड़ा पार।

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