बस बीत चुके

चलोग बाबा,
अब क्या प्रभु की ओर !
खेल पसारे बालकपन में, उकसे रहे किशोर,
आगे चल कर चन्द्रमुखी के, चाहक बने चकोर।
पकड़े प्राणप्रिया वनिता ने, बतलाये चित-चोर,
मारे कन्दुक मदन दर्प के, गोल उरोज कठोर।
दुहिता-पुत्र घने उपजाये, भोग बटोर-बटोर,
अगुआ बने बढ़े कुनवा के, पकड़ा पिछला छोर।
पटके गाल अंग सब झूले, अटके संकट घोर,
‘शंकर’ जीत जरा ने जकडे़, उतरी मद की खोर।

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