सौन्दर्य की दुर्दषा

नवेली उठ बोल !
वेणी-नागिन विकल पड़ी है, शिथिल माँग मुख खोल,
खंजरीट मृग खोल रहे हैं, नयन-सुयश की पोल।
लला अधर बिम्बा-फल सूखे, पड़ गये पीत कपोल,
दशन-मोतियों की लड़ियों का, अब न रहा कुछ मोल।
कंबु-कण्ठ-कल-कण्ठ न कूके, दबकी दमक अतोल,
गढ़ें न रसियों की छतियों में, कठिन पयोधर गोल।
परखी सब कोमल अंगों में, अकड़ टटोल-टटोल,
हा! ‘शंकर’ क्या अब न बजेगा, मदन-विजय का ढोल।

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