सद्गुरु गौरव – २

श्री गुरुदेव दयालु हमारे,
बड़भागी हम सेवक सारे।
बाल ब्रह्मचारी बुध नीके, जीवनमुक्त सुधाम सुधीके,
सांचे शुभचिन्तक सब ही के, विरति-वाटिका के रखवारे।
धर्मवीर सागर साहस के, रसिया सामाजिक सुख-रस के,
दिन-नायक उपदेश-दिवस के, मोह महातम टारन हारे।
दीपक पर-उपकार-सदन के, दावानल अवगुण-गण-वन के,
पंचानन अघ-ओघ मृगन के, कीरति-कामिनि के चखतारे।
ध्रुव सम्राट समाधि-धरा के, रक्षक रानी ऋतम्भरा के,
प्रेमी अपरा और परा के, परम सिद्ध ‘शंकर’ के प्यारे।

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