संशयात्मा

हमने असार संसार को, छोड़ा पर छोड़ न पाया।
कर सत्संग चरित्र सुधारे,
भोग-विलास विसारे सारे,
श्रहे लोक-लीला से न्यारे-
भारत विचार-कुठार को, भ्रम का शिर फोड़ न पाया।
मेल समोद महाव्रत मन में,
धरि मुनि-वेश बसे कानन में,
ध्यान लगाय योग-साधन में-
मथ कर ज्ञानागार को, पीयूष निचोड़ न पाया।
पाँचों भूतों को पहचाना,
मिला जीव को ठीक ठिकाना,
जड़-चेतन-मय सब जग जाना-
अविनाशी करतार को, अपने में जोड़ न पाया।
परम सिद्ध ऋषिराज कहाये,
नित सुकर्म-सागर में न्हाये,
अब तो दिवस अंत के आये-
जन्म-मरण के तार को कवि ‘शंकर’ तोड़ न पाया।

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