नरक निदर्शन

हम सब एक पिता के पूत।
हा! विशाल मानव-मण्डल में, उपजे उद्धत ऊत,
मान लिये इन मतवालों ने, भिन्न-भिन्न मत-भूत।
सामाजिक बल को लग बैठी, छल की छूत अछूत,
जल कर जाति-पांति ने तोड़ा, सुख-साधन का सूत।
प्रभुता पाय दहाड़ रहे हैं, सबल रुद्र के दूत,
पिण्ड पड़ी कुटिला कुनीति की, रोष-भरी करतूत।
भड़क रही तीनों नरकों में, अड़ की आग अकूत,
‘शंकर’ कौन बुझावे इस को, बिन विवेक-जीमूत।

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