जीवन काल

जीवन बीत रहा अनमोल,
इसको कौन रोक सकता है।
चलता काल टिके कब हाय, सटके सब को नाच नचाय,
लपका लपके किसे न खाय, अस्थिर नेक नहीं थकता है।
हायन, मास, पक्ष सित-श्याम, तैथिक मान रात-दिन याम,
भागें घटिका-पल अविराम, क्षण को भी न पैर पकता है।
सरके वर्तमान बन भूत, गति का गहे अनागत सूत,
त्रिकली, द्रुतगामी, रविदूत, किसकी छाक नहीं छकता है।
सब जग दौडे़ इसके साथ, लगता हा, न विपल भी हाथ,
सुनलो रंक और नरनाथ, ‘शंकर’ वृथा नहीं बकता है।

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