छबि छाई ऋतुराज की

तोरण पताकाधारी उन्नत वितान तने,
बगरी विचित्रता सजावट के साज की ।
प्रेमी कविता के सभ्य सज्जन बिराज रहे,
उलही अनूठी आभा सुकवि-समाज की।
कोष मिला मोद का साहित्य सुरपादप से,
रंजना रिझाबेगी किसे न कहो आज की।
‘शंकर’ युधिष्ठिर की राजधानी देहली में,
मानो मनमानी छबि छाई ऋतुराज की ॥1॥

मान मनमाना मिलता है खल-मण्डल को,
कौन करता है सेवा सज्जन-समाज की।
होके मालामाल मूढ़ मिट्ठू मौज मारते हैं,
लोहू चतुरों को चिन्ता चूंसती है नाज की।
गाजती है गन्दी तुकबन्दी कोरे तुक्कड़ों की,
गूंजती है कविता न कवि-कुल-ताज की।
मानो ढाक फूल हैं न ‘शंकर’ रसाल बौरे,
भूतल पै छूंछी छबि छाई ऋतुराज की ॥2॥

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