कर भला होगा भला

अब तो चेत भला कर भाई।
बालकपन में रहा खिलाड़ी, निकल गई तरुणाई,
बहुत बुढ़ापे के दिन बीत, उपजी पर न भलाई।
धर्म, प्रेम, विद्या, बल, धन की, करी न प्रचुर कमाई,
इनके बिना बटोर न पाई, सुयश बगार बड़ाई।
पिछले कर्म बिगाड़ चुका है, अगली विधि न बनाई,
चलने की सुधि भूल रहा है, सुमति समीप न आई।
संकट काट नहीं सकती है, कपट-भरी चतुराई,
ब्रह्म-ज्ञान बिन हाय किसी ने, ‘शंकर’ सुगति न पाई।

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