उलाहना

चूका चाल अचेत अनारी,
नारायण को भूला रहा है।
जीवन, जन्म वृथा खोता है, बीज अंमगल के बोता है,
खेल पसार मोह-माया के, अज्ञों के अनुकूल रहा है।
यह मेरा है, वह तेरा है, ममता-परता ने घेरा है,
झंझट-झगड़ों के झूले पै, झकझोटों से झूल रहा है।
भोग-विलास रसीले पाये, दारा-पुत्र मिले मनभाये,
मानो मृग-तृष्णा क ेजल में, व्योम-पुष्प-सा फूल रहा है।
‘शंकर’ अन्त-काल आवेगा, कुछ भी साथ न ले जावेगा,
झूठी उन्नति के अभिमानी, क्यों कुसंग के ऊल रहा है।

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