उपालम्भ

दुर्लभ नर-तन पाय के,
कुछ कर न सका रे।
घोर कुकर्म महा पापों से, पल-भर भी पछताय के,
ठग डर न सका रे।
हा! प्यारे मानव-मण्डल में, सुकृति-सुधा बरसाय के,
यश भर न सका रे।
वैदिक देवों के चरणों पै, सेवक सरल कहाय के,
सिर धर न सका रे।
दीन-बन्धु ‘शंकर’ स्वामी के, मन की लगन लगाय के,
भव तर न सका रे।

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