अर्थाभिमानी

तेरे अस्थिर हैं सब ठाठ,
इन पर क्यों घमण्ड करता है।
भिक्षुक और मेदिनीनाथ, भव तज भागे रीते हाथ,
क्या कुछ गया किसी के साथ, तो भी तू न ध्यान धरता है।
उतरी लड़काई की भंग, टूटा तरुणाई का तंग,
जमने लगा जरा रंग, भूला नेक नहीं डरता है।
होगा मरण-काल का योग, तुझ से छूटेंगे सुख-भोग,
आकर पूछेंगे पुर-लोग, अब क्यों अभिमानी मरता है।
प्यारे चेत प्रमाद विसार, कर ले औरों का उपकार,
‘शंकर’-स्वामी को उर धार, यों सद्भक्त जीव तरता है।

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