अभिलाषा

ऐसी अमित कृपा कर प्यारे।
मेघ महा भ्रम के उड़जावें तर्क-पवन के मारे,
दिव्य ज्ञान-दिनकर के आगे खिलें न दुर्मत-तारे।
संवित सिद्ध सुधारें हम को, छूटें अवगुण सारे,
उमगे न्याय-नीति की महिमा, विकसें भाव हमारे।
रहें न जन पौरुष के प्रेमी सुख-समाज से न्यारे,
डूब मरें संकट-सागर में, पतित प्रेम-हत्यारे।
अब तो सुन पुकार पुत्रों की, हे पितु पालन हारे,
‘शंकर’ क्या हम-से, बहुतेरे, अधम नहीं उद्धारे।

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