अपूर्व चिन्तन

कौन उपाय करूँ पिय प्यारो,
साथ रहै पर हाथ न आवे।
चहुँ दिसि दौरी द्वन्द्व मचायो, अचल अचंचल पकड़ न पायो,
खुलत न खेलत खेल खिलाड़ी, मोहि खिलौना मान खिलावे।
पल-भर को कबहूँ न बिसारै, हिल-मिल मेरो रूप निहारै,
रसिक शिरोमणि मो विरहिनि को, हा, अपनो मुखड़ा न दिखावे।
माया-मय मनमोहन हारे, अद्भुत योग-वियोग पसारे,
या विहार थल के भोगन को, आन न भोगे, माहि भुगावे।
करि हारी साधन बहुतेरे, होत न सिद्ध मनोरथ मेरे,
दोष कहा ‘शंकर’ स्वामी को, कुटिल कर्म-गति नाच नचावे।

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