नज़र सरशार उसकी

मनचंदा बानी के नाम

नज़र सरशार उसकी ।
फ़ज़ा बेदार उसकी ।

बहोत बातें सुनी हैं
सर-ए-बाज़ार उसकी ।

कहाँ कटता मेरा सर
मगर तलवार उसकी ।

मैं छोटा सा नगीना
बड़ी बाज़ार उसकी ।

हवा उसका तकल्लुम
शफ़क दस्तार उसकी ।

सुनी है मैंने आहट
हज़ारों बार उसकी ।

कहानी कह रही है
निगाह-ए-यार उसकी ।

नज़र आई वो सूरत
गिरी दीवार उसकी ।

फ़ज़ा इक शबनमी सी
बदन के पार उसकी ।

यहाँ क्या मैं नहीं हूँ ?
ये सब पैकार उसकी

अजब हम्द-ओ-सना है
सुख़न के पार उसकी ।

दिखा दे कोई ‘अजमल’
झलक इक बार उसकी

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