जुदा ख़ुद से होता हुआ सामने

जुदा ख़ुद से होता हुआ सामने ।
ऐसा मंज़र के जैसे ख़ुदा सामने ।

फूल महका हुआ दिल में इम्कान का
और समंदर लहकता हुआ सामने ।

तन-बदन में सितारे उतरते हुए
रास्ता इक दहकता हुआ सामने ।

सानेहा इक नज़र से गुज़रता हुआ
एक मज़र बिछड़ता हुआ सामने ।

फिर अंधेरा नज़र में चमकता हुआ
फिर उभरता हुआ सर मेरा सामने ।

हाँ, निकालो मेरि जान सूरज कोई
वो देखो है काली घटा सामने ।

मैं तो अपना ही क़द पार कर न सका
आ गया कोई मुझसे बड़ा सामने ।

सामने टूटी-फूटी सदा का खंडर
दूर गहराई में इक ख़ला सामने ।

आसमाँ सर में फैलाव लेता हुआ
इक सिमटती हुई सी दुआ सामने ।

सब्ज़ जितने शजर थे वो कटते रहे
क्या बताएँ कि क्या-क्या हुआ सामने ।

न है धूप कोई परों के परे
न ख़ंजर चमकता हुआ सामने ।

ज़िंदगी एक मौज-ए-फ़ना का सुरूर
सर-बसर एक मौज-ए-हवा सामने ।

ये वही शख़्स है! क्या वही शख़्स है ?
वो जो आया था हँसता हुआ सामने ।

हादिसा जाने क्या उसके अन्दर हुआ
आज ‘अजमल’ है चुप-चुप खड़ा सामने ।

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